सोचो साथ क्या जाएगा विश्व साहित्य संकलन पहला खंड लातिन और उत्तरी अमेरिका
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इब्तिदा
‘सोचो साथ क्या जाएगा?’
सस्ती जुमलेबाज़ी के बीच टाटा की ट्रकों के पीछे लिखा यह बहुआयामी सवाल नयी सदी कीष्शुरुआत में हमारी सोच का पर्याय भी हो सकता है। क्योंकि एक पूरी शताब्दी का सफ़र तय कर चुकने के बाद हम तकनीकी ‘समृद्धि’ से संपन्न इक्कीसवीं सदी के जिस सिंहद्वार से प्रवेश कर चुके हैं, वहाँ शायद हाथ से लिखा हुआ शब्द बहुत देर तक हमारा साथ न दे पाए। आइन रैंड द्वारा रचे किसी साहित्यिक दुःस्वप्न की तरह हो सकता है कि कलम, काग़ज़, किताबें, सब असंगत करार दिए जाएँ और इलेक्ट्रॉनिक चमत्कार की दुनिया में शायद अपनी समूची चेतना को हम बोले गए शब्द (वॉयस मेल?) या स्क्रीन पर दिखाई देती जीवंत परछाई तक सीमित रखना सीख जाएँ, या फिर न सीख पाने की मजबूरी में अपने ‘वर्तमान’ से ख़ारिज कर दिए जाएँ।
इस ऐतिहासिक सिंहद्वार के बाहर इक्कीसवीं सदी का जश्न मनाते हुए एक नज़र पीछे को लौटती है, जहाँ से हम आए हैं, जहाँ हमारा बचपन, हमारा समूचा स्मृति-संसार है; जहाँ से हमने शब्द को संस्कृति से जोड़कर समझने की तमीज़ सीखी है। लेकिन शब्द की पराकाष्ठा की इस पिछली सदी में अपने सारे अन्वेषण के बावजूद न जाने कितना कुछ हमसे छूट गया है, जिसे हम छू नहीं पाए, जो हमसे बहुत दूर था या जिसपर हमारी नज़र पड़ने से रह गयी।
विश्व साहित्य के इस अकूत खज़ाने में से अगली सदी में साथ ले चलने लायक कुछ दुर्लभ, अनदेखा सामान चुनने के संदर्भ में ही इस शृंखला का शीर्षक निकला है। लेकिन चुनने का यह काम न सिर्फ बेहद मुश्किल, बल्कि ख़ासा ‘सब्जेक्टिव’ एवं विवादास्पद भी है। प्राधिकारिता के किसी भी दावे के बग़ैर इस आयोजन में कुछ ऐसी अपरिचित एवं विलक्षण रचनाओं को चुना गया है जो अपने समय की महत्वपूर्ण धरोहर होने के साथ-साथ हिंदी के पाठक के लिए नयी भी हैं। हर रचना के भावात्मक तेवर का जायज़ा लेने वाली एक संक्षिप्त टिप्पणी भी है जो लेखक के साथ-साथ उस रचना के समय का भी लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। अनेक खंडों में बंटी रचना की यह विश्व यात्रा अनेकानेक भाषाओं एवं प्रदेशों तक फैली है, लेकिन फिर भी दुनिया के सारे प्रदेशों या कि भाषाओं का आकलन इस आयोजन का प्राथमिक उद्देश्य नहीं था। सभी रचनाओं को मूलतः अँग्रेज़ी अनुवादों के आधार पर अंतिम रूप दिया गया है।
इस प्रथम खंड में उत्तर और लातिन अमेरिका के लेखकों की चुनी हुई रचनाओं को लिया गया है। मैं इसे इन रचनाओं का सार्वभौमिक प्रभाव ही समझता हूँ कि इस आयोजन की बहुत सारी कहानियाँ हिंदी में प्रकाशित होने के बाद इन्हीं अनुवादों के सहारे भारत की अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित हुई और इन रचनाओं ने अपना पाठक वर्ग स्वयं तैयार किया।
इन चंद शब्दों के साथ आइए, रचनाओं की इस वैश्विक दुनिया में चलें।
इब्तिदा
‘सोचो साथ क्या जाएगा?’
सस्ती जुमलेबाज़ी के बीच टाटा की ट्रकों के पीछे लिखा यह बहुआयामी सवाल नयी सदी कीष्शुरुआत में हमारी सोच का पर्याय भी हो सकता है। क्योंकि एक पूरी शताब्दी का सफ़र तय कर चुकने के बाद हम तकनीकी ‘समृद्धि’ से संपन्न इक्कीसवीं सदी के जिस सिंहद्वार से प्रवेश कर चुके हैं, वहाँ शायद हाथ से लिखा हुआ शब्द बहुत देर तक हमारा साथ न दे पाए। आइन रैंड द्वारा रचे किसी साहित्यिक दुःस्वप्न की तरह हो सकता है कि कलम, काग़ज़, किताबें, सब असंगत करार दिए जाएँ और इलेक्ट्रॉनिक चमत्कार की दुनिया में शायद अपनी समूची चेतना को हम बोले गए शब्द (वॉयस मेल?) या स्क्रीन पर दिखाई देती जीवंत परछाई तक सीमित रखना सीख जाएँ, या फिर न सीख पाने की मजबूरी में अपने ‘वर्तमान’ से ख़ारिज कर दिए जाएँ।
इस ऐतिहासिक सिंहद्वार के बाहर इक्कीसवीं सदी का जश्न मनाते हुए एक नज़र पीछे को लौटती है, जहाँ से हम आए हैं, जहाँ हमारा बचपन, हमारा समूचा स्मृति-संसार है; जहाँ से हमने शब्द को संस्कृति से जोड़कर समझने की तमीज़ सीखी है। लेकिन शब्द की पराकाष्ठा की इस पिछली सदी में अपने सारे अन्वेषण के बावजूद न जाने कितना कुछ हमसे छूट गया है, जिसे हम छू नहीं पाए, जो हमसे बहुत दूर था या जिसपर हमारी नज़र पड़ने से रह गयी।
विश्व साहित्य के इस अकूत खज़ाने में से अगली सदी में साथ ले चलने लायक कुछ दुर्लभ, अनदेखा सामान चुनने के संदर्भ में ही इस शृंखला का शीर्षक निकला है। लेकिन चुनने का यह काम न सिर्फ बेहद मुश्किल, बल्कि ख़ासा ‘सब्जेक्टिव’ एवं विवादास्पद भी है। प्राधिकारिता के किसी भी दावे के बग़ैर इस आयोजन में कुछ ऐसी अपरिचित एवं विलक्षण रचनाओं को चुना गया है जो अपने समय की महत्वपूर्ण धरोहर होने के साथ-साथ हिंदी के पाठक के लिए नयी भी हैं। हर रचना के भावात्मक तेवर का जायज़ा लेने वाली एक संक्षिप्त टिप्पणी भी है जो लेखक के साथ-साथ उस रचना के समय का भी लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। अनेक खंडों में बंटी रचना की यह विश्व यात्रा अनेकानेक भाषाओं एवं प्रदेशों तक फैली है, लेकिन फिर भी दुनिया के सारे प्रदेशों या कि भाषाओं का आकलन इस आयोजन का प्राथमिक उद्देश्य नहीं था। सभी रचनाओं को मूलतः अँग्रेज़ी अनुवादों के आधार पर अंतिम रूप दिया गया है।
इस प्रथम खंड में उत्तर और लातिन अमेरिका के लेखकों की चुनी हुई रचनाओं को लिया गया है। मैं इसे इन रचनाओं का सार्वभौमिक प्रभाव ही समझता हूँ कि इस आयोजन की बहुत सारी कहानियाँ हिंदी में प्रकाशित होने के बाद इन्हीं अनुवादों के सहारे भारत की अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित हुई और इन रचनाओं ने अपना पाठक वर्ग स्वयं तैयार किया।
इन चंद शब्दों के साथ आइए, रचनाओं की इस वैश्विक दुनिया में चलें।
जितेन्द्र भाटिया
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