सोचो साथ क्या जाएगा विश्व साहित्य संकलन पहला खंड लातिन और उत्तरी अमेरिका
https://www.amazon.in/dp/B085S5VMR5?ref=myi_title_dp इब्तिदा ‘सोचो साथ क्या जाएगा?’ सस्ती जुमलेबाज़ी के बीच टाटा की ट्रकों के पीछे लिखा यह बहुआयामी सवाल नयी सदी कीष्शुरुआत में हमारी सोच का पर्याय भी हो सकता है। क्योंकि एक पूरी शताब्दी का सफ़र तय कर चुकने के बाद हम तकनीकी ‘समृद्धि’ से संपन्न इक्कीसवीं सदी के जिस सिंहद्वार से प्रवेश कर चुके हैं, वहाँ शायद हाथ से लिखा हुआ शब्द बहुत देर तक हमारा साथ न दे पाए। आइन रैंड द्वारा रचे किसी साहित्यिक दुःस्वप्न की तरह हो सकता है कि कलम, काग़ज़, किताबें, सब असंगत करार दिए जाएँ और इलेक्ट्रॉनिक चमत्कार की दुनिया में शायद अपनी समूची चेतना को हम बोले गए शब्द (वॉयस मेल?) या स्क्रीन पर दिखाई देती जीवंत परछाई तक सीमित रखना सीख जाएँ, या फिर न सीख पाने की मजबूरी में अपने ‘वर्तमान’ से ख़ारिज कर दिए जाएँ। इस ऐतिहासिक सिंहद्वार के बाहर इक्कीसवीं सदी का जश्न मनाते हुए एक नज़र पीछे को लौटती है, जहाँ से हम आए हैं, जहाँ हमारा बचपन, हमारा समूचा स्मृति-संसार है; जहाँ से हमने शब्द को संस्कृति से जोड़कर समझने की तमीज़ सीखी है। लेकिन शब्द की पराकाष्ठा की इस पिछली सद...